Hearing in Hindi in the Supreme Court

OVERVIEW

सुप्रीम कोर्ट में हिंदी में सुनवाई

विषय सूचि:

  • प्रस्तावना (Introduction)
  • News में क्यों है?
  • भारत का संविधान हिंदी भाषा के बारे में क्या कहता है?
  • सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक भाषा (official language) क्या है?
  • भाषा से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  • हिन्दी भाषा के प्रयोग से क्या लाभ होंगे?
  • हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा: यह मिथ है या वास्तविकता
  • अंग्रेजी भाषा को खत्म करने से हमें जो नुकसान हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं
  • क्षेत्रीय भाषाएं
  • अन्य देश की भाषाएं
  • निष्कर्ष

हमारी न्यायिक प्रणाली औपनिवेशिक युग की विरासत है; सबकी आवश्यकताएं अलग है, कोई इसे सीधे हिंदी भाषा में ट्रांसफर नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट केवल उत्तर भारतीय राज्यों से संबंधित मामलों को भी संबोधित करता है बल्कि देश के अन्य हिस्सों के मामलों को भी संबोधित करता है। जब तक भारत सरकार संविधान में निहित क्षेत्रीय भाषाओं के बारे में कोई समाधान नहीं निकालती है और आम लोगों को पर्याप्त रूप से संप्रेषित नहीं करती है, तब तक कानून और न्याय अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा और समाज तक नहीं पहुंच पाएगा।

अंग्रेजी भाषा ने देश में एक अपरिहार्य और अपूरणीय स्थिति ले ली है और एक विश्व की भाषा बन गई है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के निर्णयों को दुनिया के अन्य देशो के न्यायालयों में भी पढ़ा जाता है और उद्धृत किया जाता है।

भारत हजारों वर्षों से एक बहुभाषी देश रहा है। हर क्षेत्र और हर राज्य की एक अलग भाषा होती है, और उस विशेष क्षेत्र में हर भाषा का काफी प्रभाव होता है। भारत की विशालता और भव्यता पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। भारत में क्षेत्रीय, धार्मिक, सांस्कृतिक, जाति, पंथ और भाषाई विविधता वाले 1.39 बिलियन से अधिक लोग हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट हिंदी भाषा में कार्यवाही करना प्रांरभ करता है  तो, यह भविष्य में अदालतों और कानूनी पेशेवरों के बीच उनके अभ्यास के स्थान के आधार पर एक प्रकार का कृत्रिम भाषा-आधारित वर्गीकरण बन जाएगा, और यह प्रणाली के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है।

प्रस्तावना (Introduction):

भारत में भाषा हमेशा से एक भावनात्मक मुद्दा रहा है। भाषा की समस्या, भारतीय राजनीति में सबसे विवादास्पद रहा है। भारत के 25 विभिन्न उच्च न्यायालयों में राज्यों की अलग-अलग आधिकारिक भाषाओं के कारण, न्यायालय पर काम का भार बहुत बढ़ गया है, जिसका भारतीय न्यायिक प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। भाषा केवल विचार और अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उच्च स्तरीय न्यायाधीशों के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है।

हिंदी भाषा को सभी भाषाओ का हीरो कहा जाता है और अचानक से हिंदी भाषा को खतम करके उसकी जगह इंग्लिश भाषा कर दी जाये तो यह कटी सही नहीं होगा। क्योंकि हमारे भारत देश में बहुसंख्यक लोगों की भाषा हिंदी है। हालांकि, भारत के कई लोग, विशेष रूप से दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में, हिंदी भाषा के बदले में उनकी छेत्रिय भाषा में बात करते है और यदि माननीय सुप्रीम कोर्ट में हिंदी में सुनवाई होगी तो दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों के लोग हिंदी के पक्ष में नहीं होंगे।

एक मामले, मधु लिमये Vs. वेद मूर्ति में, उच्चतम न्यायालय के समक्ष अंग्रेजी का प्रयोग करने पर कठिनाई आई उसके बारे में बताया था। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष हिंदी भाषा में दलील पेश की इसका विरोध दूसरे पार्टी ने खा की हिंदी में दलीले पेश नहीं की जा सकती क्योकि वह समझने में असमर्थ है। याचिकाकर्ता ने अंग्रेजी में बहस करने से इनकार कर दिया और यहां तक कि अपने वकील को अदालत के सामने बोलने से भी मना कर दिया। तब सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 348 का हवाला देते हुए कहा कि अदालत की भाषा अंग्रेजी है अंग्रेजी भाषा में ही दलीले पेश करे और इसके हस्तक्षेप को रद्द कर दिया।

इस प्रकार, यदि उच्च न्यायपालिका में अंग्रेजी को महत्व दिया जायेगा, तो क्या कुछ अदालतों में इसे पूरी तरह से बाहर करना उचित होगा? इस तर्क में दम है कि वादी जिला न्यायालय स्तर की कार्यवाही को अपनी भाषा में बेहतर ढंग से संहा सकता है तो साथ ही समझ भी सकता है। लेकिन जब हम बात सुप्रीम कोर्ट की करे तो क्या यह उन लोगों के लिए उचित होगा जो केवल हिंदी या केवल अंग्रेजी या कोई अन्य भाषा जानते हैं? तो यह सही नहीं लगता, और यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करेगा। दक्षिण भारत की भाषा उत्तर भारत से भिन्न है, और ऐसा ही पूर्व और पश्चिम में भी है। ऐसे में हिंदी को पूरे देश में लागू करना असंभव है। यहाँ, अंग्रेजी आम भाषा है।

क्या भारत के सभी न्यायालयों में हिंदी को एक भाषा के रूप में अनिवार्य करना सही है? क्या यह 20 से अधिक भाषाओं वाले देश में व्यावहारिक, व्यवहार्य या वांछनीय भी है? आज अंग्रेजी को केवल विदेशी भाषा नहीं माना जा सकता। अंग्रेजी का उपयोग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संचार के लिए किया जाता है। संविधान की आठवीं अनुसूची 22 विभिन्न भाषाओं को मान्यता मिली हुई है। भारत के संविधान ने उच्च न्यायपालिका में भी अंग्रेजी के महत्व को मान्यता देता है।

News में क्यों है?

पटना हाईकोर्ट के वकील बरमहदेव प्रसाद 21 जनवरी 2022 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने पहुंचे हैं। याचिका को हिंदी में लिखा देख सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार कार्यालय ने नाराजगी जताई और अपनी याचिका का हिंदी में अनुवाद दाखिल करने को कहा।  जब प्रसाद ने ऐसा करने से मन कर किया, तो रजिस्ट्रार ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 348 की बाध्यता के कारण याचिका हिंदी में दायर नहीं की जा सकती है। फिर प्रसाद ने उन्हें अनुच्छेद 300, 351, और मौलिक अधिकार 13 और 19 दिखाए, जो हिंदी के साथ भेदभाव करने का प्रावधान करते हैं। हिंदी में लिखी गई याचिका को सुप्रीम कोर्ट प्रशासन को स्वीकार करना पड़ा। आखिरकार, उनकी जनहित याचिका ली गई और सुप्रीम कोर्ट अगले महीने इस पर हिंदी में सुनवाई करेगा।

ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट हिंदी में सुनवाई कर रहा है तो दूसरे राज्यों के लोग भी अपनी क्षेत्रीय भाषा में सुनवाई की मांग करेंगे। और अगर भविष्य में सुप्रीम कोर्ट उनकी चेतिर्या भाषा में सुनवाई के लिए हा क्र देगा तो क्या सुप्रीम कोर्ट के पास इतने अलग अलग भाषा में सुनवाई करने के लिए जज होंगे? और क्या वह जनता को न्याय दे पायेगी? साथ ही विभिन्न राज्यों की न्यायपालिका के बीच संचार भी टूट जाएंगे। इसके अलावा भाषाई कट्टरपंथियों के कारण देश की एकता और अखण्डता प्रभावित होना लाजमी है।

भारत का संविधान हिंदी भाषा के बारे में क्या कहता है?

  • हमारे भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 में, वादी को न्यायालय की कार्यवाही को समझने और उसमें भाग लेना, एक मौलिक अधिकार है।
  • वादी को मजिस्ट्रेट के सामने उस भाषा में बोलने का अधिकार है जिसे वे समझते हैं। इसी तरह, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत "न्याय के अधिकार" को भी मान्यता दी गई है।
  • इसलिए, संविधान ने वादी को न्याय का अधिकार प्रदान किया है, जिसमें उसे पूरी कार्यवाही और दिए गए निर्णय को समझने का अधिकार दिया हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक भाषा क्या है?

  • आधिकारिक भाषा अधिनियम में सर्वोच्च न्यायालय की भाषा से सम्बंधित कोई उल्लेख नहीं है; परन्तु हमारे भारत के संविधान में सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी होगी, अन्य भाषा में कोई कार्यवाही नहीं होगी। क्योकि इसे समझना आसान है।
  • जिस तरह पूरे देश के मामले सुप्रीम कोर्ट में आते हैं, जो अलग-अलग भाषाओं के होते हैं, उसी तरह सुप्रीम कोर्ट के जज और वकील भी भारत के सभी हिस्सों से आते हैं। उस स्थिति में, न्यायाधीशों से शायद ही अन्य भाषाओं में दस्तावेज़ पढ़ने और उन भाषाओं में तर्क सुनने की उम्मीद की जा सकती है जिनसे वे अपरिचित हैं। सुप्रीम कोर्ट के सभी फैसले भी अंग्रेजी में दिए जाते हैं।

भाषा से संबंधित संवैधानिक प्रावधान:

  • भारत के संविधान के भाग XVII, अनुच्छेद 343 से 351 आधिकारिक भाषाओं से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 348(1)() में कहा गया है कि जब तक संसद कानून द्वारा अन्यथा प्रदान नहीं करती है, सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय के समक्ष सभी कार्यवाही अंग्रेजी में संचालित की जाएगी।
  • अनुच्छेद 348(2) यह भी प्रावधान करता है कि अनुच्छेद 348 (1) के प्रावधानों के बावजूद, किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, एक विदेशी भाषा में बोल सकता है या हिंदी भाषा में कार्यवाही कर सकता है।
  • संसद ने राजभाषा अधिनियम 1963 में यह अधिनियमित किया की, राज्य का राज्यपाल अंग्रेजी के अलावा हिंदी भाषा का उपयोग उच्च न्यायालय द्वारा पारित किसी भी निर्णय, डिक्री, या आदेश के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से कर सकता है। यह आगे प्रावधान करता है कि अंग्रेजी में ऐसी किसी भी भाषा में दिए गए किसी भी निर्णय, डिक्री या आदेश के साथ अनुवाद होना चाहिए।
  • स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने स्वतंत्र भारत की एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को लागू करने का निर्णय लिया। हिंदी आर्य भाषाओं की वंशावली से संबंधित थी। लेकिन भारतीय संविधान ने घोषणा की थी कि आधिकारिक उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही अंग्रेजी में दी जानी चाहिए।

हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा: मिथ है या वास्तविकता

  • संविधान ने कभी भी हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया है; इसके बजाय, 1950 में, इसने अनुच्छेद 343 के तहत अंग्रेजी के साथ देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी।
  • 2010 में, गुजरात उच्च न्यायालय ने देखा कि यद्यपि भारत में अधिकांश लोगों ने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया है, लेकिन हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा घोषित नहीं की।
  • सामान्यतया, भारत में अधिकांश लोगों ने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया हुआ है, और कई हिंदी बोलते हैं और देवनागरी लिपि में लिखते हैं। फिर भी, हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा घोषित करने के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

अंग्रेजी भाषा को खत्म करने पर हमें जिन नुकसानों का सामना करना पड़ सकता है, वे इस प्रकार हैं:

  1. कई भाषाओ को सीखना पड़ेगा:
  • कानूनी भाषा सिखने में आसान नहीं होती है। भाषा के शब्दों, अर्थों और विविधताओं को सीखने और समझने में समय लगता है। उन्हें दो भाषाओं में जानना और उनके बीच स्विच करना एक चुनौतीपूर्ण काम है।
  • वकीलों की दो पीढ़िया हिंदी में कानूनी लेन-देन में प्रशिक्षित होने के बाद, यदि सर्वोच्च न्यायालय हिंदी में कार्यवाही शुरू करता है, तो उन वकीलों के लिए भाषा बदलना आत्मघाती होगा।
  • इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय में विभिन्न राज्यों के न्यायाधीश होते हैं जो शायद हिंदी नहीं जानते हैं तो ऐसे जज के लिए हिंदी में कार्यवाही करना असंभव होगा। क्षेत्रीय भाषा को बदलना आसान नहीं हो सकता है क्योंकि व्यावहारिक रूप से हर राज्य ने इसे संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत अपनाया है।
  1. एकरूपता:
  • वर्तमान में, भारत में न्यायिक प्रणाली पूरे देश में अच्छी तरह से विकसित, एकीकृत और एक समान है। यदि अंग्रेजी भाषा को समाप्त कर दिया जाता है, तो देश की अखंडता को बनाए रखने वाले सभी राज्यों में एकरूपता नहीं होगी।
  • आमतौर पर जिस भाषा में विभिन्न राज्यों या केंद्र सरकार और एक राज्य या व्यक्ति के बीच संचार होता है, वह अंग्रेजी होती है।
  1. प्रभावी लागत:
  • विभिन्न उच्च न्यायालयों में सभी विधि पत्रिकाओं सहित शेष सभी कानून पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में हैं, और उन पुस्तकों के अनुवाद पर करोड़ों रुपये खर्च होंगे। जब हमारे पास गरीब लोगों की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन नहीं होगा, कुछ भाषाविदों को संतुष्ट करने के लिए एक बड़ी राशि खर्च करना सार्वजनिक धन की बर्बादी होगी।
  • एक बहुभाषी कानूनी प्रणाली से मुकदमेबाजी की लागत में वृद्धि होने की संभावित है, क्योकि एक बड़ी मात्रा में अनुवाद का कार्य करना पड़ेगा जिसमे समय के साथ साथ पैसो की भी लगत आएगी।
  • फिर भी, विदेशी निवेश की सहायता से भारत में आर्थिक और औद्योगिक विकास की प्रकृति, स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने और अदालतों में अंग्रेजी के उन्मूलन का निवेशकों पर फिर से निराशाजनक प्रभाव पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय समझौतों में अदालतों को मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर अंग्रेजी में विचार करना चाहिए और उनकी व्याख्या करनी चाहिए।
  1. आसान पहुँच नहीं हो पायेगी:
  • वकीलों और न्यायाधीशों को कानून और संविधान के अन्य मामलों पर समान कानूनों और अन्य उच्च न्यायालयों के विचारों तक आसान पहुंच का लाभ मिलता है वो नहीं मिल पायेगा।
  • अधिकांश क़ानून और निर्णय अंग्रेजी में हैं। सबसे पहले, अनुवाद पूर्ण और सटीक होना चाहिए। दूसरे, विभिन्न भाषाओं में विभिन्न संस्करणों से कानूनी प्रावधानों की अस्पष्ट व्याख्या होगी। ऐसे मामलों में बहुभाषावाद समाधान के बजाय समस्या का हिस्सा बन जाएगा।
  1. निर्बाध स्थानांतरण (Seamless Transfer):
  • वर्तमान में, एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अन्य उच्च न्यायालयों में निर्बाध (Seamless) रूप से स्थानांतरित किया जाता है। वर्तमान में, एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अन्य उच्च न्यायालयों में निर्बाध रूप से स्थानांतरित किया जाता है। इसने भारतीय न्यायिक प्रणाली को एक एकीकृत संरचना प्रदान की है।
  • ऐसे में स्थानीय भाषा के अनुवाद, व्याख्या और समझ के कारण मामलों की सुनवाई में अधिक समय लगेगा। 
  1. एकीकृत संरचना:
  • ज्यादातर कानूनी कहावतें लैटिन भाषा में हैं और भारतीय भाषाओं में उनके अनुरूप शब्द नहीं होते हैं। स्थानीय भाषाएँ, कानूनी शब्दावली से रहित हैं, और शब्दकोश और शब्दावलियाँ सिमित ही उपलब्ध हैं।
  • इसने भारतीय न्यायिक प्रणाली को एक एकीकृत संरचना प्रदान की है। किसी भी मजबूत कानूनी प्रणाली की पहचान यह है कि कानून निश्चित, सटीक और अनुमानित होना चाहिए, और हमने भारत में इसे लगभग हासिल कर लिया है।
  1. भाषा का बोझ:
  • काफी हद तक, हम अंग्रेजी भाषा के ऋणी हैं, जहां हमारे पास लगभग दो दर्जन से भी अधिक आधिकारिक राज्य भाषाएं हैं, इसमें हिंदी भाषा ने भारत के लिए एक कड़ी के रूप में कार्य किया है।
  • कानूनी समुदाय में अंग्रेजी स्थापित भाषा है। अंग्रेजी एक अधिक स्वीकार्य भाषा है, और इसका उपयोग उच्च न्यायपालिका में 150 से अधिक वर्षों से किया जा रहा है।
  • हिंदी के आने से सुप्रीम कोर्ट पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। यह फायदेमंद से ज्यादा सिस्टम के लिए हानिकारक होगा। कुछ अंग्रेजी को औपनिवेशिक मान सकते हैं। लेकिन इस बदलाव से न्यायपालिका पर बोझ बढ़ेगा। हमारे पास पहले से ही मामलों का एक बड़ा बैकलॉग है, न्यायाधीशों की कमी है, और कई अन्य मुद्दे हैं जिन्हें और अधिक तत्काल संबोधित करने की आवश्यकता है।
  • भारतीय प्रणाली के तहत, मूल साहित्य मुख्य रूप से अंग्रेजी और अमेरिकी पाठ्यपुस्तकों और केस कानूनों पर आधारित है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के 80 फीसदी जज और एडवोकेट अंग्रेजी पढ़ने, लिखने और बोलने में दक्ष हैं। इसलिए अधिवक्ताओं के लिए हिंदी में बहस करना मुश्किल हो जाएगा।
  • न्यायालय की भाषा को स्थानीय भाषा में बदलने से वकीलों के अभ्यास में बाधा आएगी क्योंकि अधिकांश वकीलों को अंग्रेजी में काम करने और बहस करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
  • इसके अलावा, जो लोग स्थानीय बोली से परिचित नहीं होंगे, वे वकीलों पर भरोसा करने में झिझकेंगे। इसके अलावा, जो वकील अन्य राज्यों की स्थानीय भाषाओं में पारंगत नहीं हैं, वे उस केस को लेने में संकोच करेंगे और केवल अपने स्थानीय अदालतों और राज्य तक ही सीमित रहेंगे।
  1. विभिन्न भाषाओं में अभ्यास करना आसान नहीं:
  • बहुत से युवा वकील जो न्यायिक सेवा परीक्षाओं के लिए उपस्थित होना चाहते हैं, और उनके पास केवल अंग्रेजी भाषा का ही ज्ञान होता है, उन्हें अपने गृह राज्यों के बाहर परीक्षाओं में बैठने से नुकसान होगा। वे दूसरे राज्य की परीक्षा पास नहीं कर सकते हैं।
  • इसके बाद, नियुक्त होने पर भी वे अपने कर्तव्य का निर्वहन तब तक नहीं कर पाएंगे जब तक कि वे उस विशेष राज्य की स्थानीय भाषा नहीं जानते या नहीं सीख लेते। यह कई लोगों को अपने राज्य के बाहर न्यायिक सेवा पदों के लिए आवेदन करने से हतोत्साहित करेगा, जिससे अन्य प्रकार की सर्वोत्तम संभव प्रतिभा से वंचित हो जाएगा।
  1. क्षेत्रीय भाषाएँ:
  • हिंदी भाषा सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है (भारत में लगभग 43.63% लोग)
  • भारत की संविधान सभा ने 14 सितंबर, 1949 को अनुच्छेद 343(1) के तहत देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी और अंग्रेजी को देश की राजभाषा के रूप में अपनाया।
  • संविधान बनाने वालों के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न, क्षेत्रीय भाषाओं के भविष्य का था। उनका मानना ​​था कि इन क्षेत्रीय भाषाओं को उन्नत और विकसित किया जाना चाहिए ताकि भाषाएं देश के भविष्य को स्थापित करने में सार्थक भूमिका निभा सकें।
  • भाषा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संविधान संशोधन अधिनियम 1956 द्वारा अनुच्छेद 350 () और 350 (बी) को शामिल किया गया था।
  • इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए, संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 क्षेत्रीय भाषाएँ है, जिसमें असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं।
  • दक्षिणी राज्यों के उच्च न्यायालय के 90 प्रतिशत अधिवक्ता हिंदी में कोई कानूनी कार्य नहीं कर सकते हैं क्योकि उन्हें हिंदी भाषा के बारे में कोई ज्ञान नहीं है और साथ ही दक्षिणी राज्यों के उच्च न्यायालयों में एक भी आशुलिपिक उपलब्ध नहीं है जो भाषा का ट्रांसलेशन कर सके।

हिन्दी भाषा के प्रयोग से क्या लाभ होंगे?

  • प्रत्येक नागरिक को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून को समझने का अधिकार है, और वर्तमान में ऐसी भाषा केवल हिंदी है।
  • हिंदी भाषा वकीलों को निचली अदालतों से उच्च न्यायालयों में जाने की सुविधा भी देती है क्योंकि उन्हें भाषाई समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है, और हिंदी भाषा दोनों स्तरों पर बनी रहती है।
  • हिन्दी की शुरूआत से उन वकीलों को मदद मिलेगी जिन्हें अंग्रेजी बोलने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

अन्य देश की भाषाएँ:

  • अबू धाबी के एक ऐतिहासिक निर्णय में, वह की अदालत ने यह कहा की न्याय तक पहुंचने के लिए अरबी और अंग्रेजी के साथ हिंदी भाषा का भी उपयोग होना चाइये और इसे तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किया है। इसका उद्देश्य हिंदी बोलने वालों को बिना किसी बाधा के मुकदमे की प्रक्रियाओं, उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जानने में मदद करना है।
  • जापान के सर्वोच्च न्यायालय में जापानी भाषा की अनुमति है, चीन के सर्वोच्च न्यायालय में चीनी भाषा की अनुमति है, और फ्रांस के सर्वोच्च न्यायालय में फ्रेंच की अनुमति है। फिर भी, यह दयनीय है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में हिंदी की अनुमति नहीं है। एक विदेशी भाषा अंग्रेजी को भारतीय भाषा हिंदी की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है।

निष्कर्ष:

भारत में भाषा हमेशा से भावनात्मक मुद्दा रही है। 25 विभिन्न उच्च न्यायालयों में राज्यों की संबंधित आधिकारिक भाषाओं की शुरूआत एक बड़ी बात है जिसका भारतीय न्यायिक प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। कार्यवाही के लिए आधिकारिक राज्य भाषाओं की शुरूआत भी सीधे तौर पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्थानांतरण नीति का सामना करती है और हस्तक्षेप करती है। विभिन्न राज्यों की न्यायपालिका के बीच संचार चैनल टूट जाएंगे।

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट के हिंदी में सुनवाई के लिए हामी भरने के बाद, दक्षिण, पश्चिम के लोग अपनी आवाज उठाएंगे और सुप्रीम कोर्ट में अपनी भाषा में सुनवाई की मांग करेंगे। अब देखना यह होगा कि संसद नया कानून लाएगी या उस पर सुप्रीम कोर्ट की कोई गाइडलाइन आती है

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