Section 82 & 83 of CrPC

ऐतिहासिक निर्णय: CrPC के Section 82 और 83 के तहत एक बार करवाई शुरू होने के बाद आरोपी को नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत

जब F.I.R. एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज हो जाती है, तो पुलिस उस आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की गिरफ्तारी को रोकने के लिए व्यक्ति CrPC की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। और यदि व्यक्ति पहले से ही गिरफ्तार हो चूका है, तो उसमे गिरफ्तार व्यक्ति को जल्द से जल्द जमानत दिलाने के लिए CrPC की धारा 439 के तहत आवेदन किया जाता हैं। गिरफ्तार होने के बाद सबसे पहला काम होता है उस व्यक्ति की जमानत लेना।

जमानत क्या होती है? किसी व्यक्ति को कब जमानत मिल सकती है? यह ब्लॉग जमानत से सम्बंधित है।

जमानत का अर्थ:

जमानत का मतलब होता है की जांच प्राधिकारी या निचली अदालत के समक्ष अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करना। कोर्ट में जमानत के आवेदन देने के बाद जब बात आती है जमानत पर निर्णय देने की तो कोर्ट इन 3 बातों की जाँच करता है,

  1. यदि कोर्ट उसे जमानत दे देता है तो क्या वो आरोपी व्यक्ति जमानत मिलने के बाद ट्रायल के लिए पेश होगा या नहीं?
  2. आरोपी व्यक्ति किसी भी तरीके से सबूत या गवाह को डराने, धमकाने की कोशिश तो नहीं करेगा?
  3. अपराध की गंभीरता

अपराध के प्रकार: अपराध दो प्रकार के होते हैं:

जमानती अपराध:

  • जमानती अपराध वे अपराध होते हैं जिनमें जमानत लेना आरोपी का अधिकार है। इन अपराधों में कोई भी न्यायाधीश या पुलिस अधिकारी आरोपी व्यक्ति को जमानत से इनकार नहीं कर सकता है।

गैर-जमानती अपराध:

  • गैर-जमानती अपराध में, जमानत आरोपी का अधिकार नहीं है। लेकिन यह न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर करता है और इसके साथ ही अपराध की प्रकर्ति पर भी निर्भर करता है की उसे जमानत दी जाये या नहीं।

जमानती और गैर-जमानती अपराधों की पहचान:

  • जमानती और गैर-जमानती अपराध की की लिस्ट दी हुई है उससे ये पहचाना जाता है की कोनसा अपराध जमानती और गैर-जमानती है। उदाहरण के लिए, I.P.C की हर धारा के तहत, यह उल्लेख किया गया है कि वो अपराध जमानती है या गैर-जमानती। यदि अपराध जमानती है तो उसमे अपराधी को आसानी से जमानत मिल जाती है।
  • लेकिन यदि अपराध गैर जमानती है तो उसमे पुलिस के द्वारा आरोपी व्यक्ति को जमानत नहीं जाती है। उसमें व्यक्ति को सामान्य जमानत के लिए या अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करना होता है। यह भी इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है या नहीं। यदि व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो वो उसमे अग्रिम जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता है।

अग्रिम जमानत की अवधारणा:

  • यदि व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया गया है लेकिन उस व्यक्ति को संभावना होती है कि उसे किसीभी वक्त गिरफ्तार किया जा सकता है तो धारा 438 CrPC के तहत अग्रिम जमानत का आवेदन दिया जाता है।
  • अग्रिम जमानत देने का अधिकार केवल Court of Session या फिर High Court के पास ही होता है। सबसे पहले आवेदन Court of Session में लगाई जाती है और जब यह से आवेदन ख़ारिज हो जाता है तो High Court के पास लगाई जाती है।
  • यदि एक बार FIR होने के बाद आरोपी गिफ्तार हो जाता है तो अग्रिम जमानत का आवेदन नहीं किया जा सकता है। यह तभी दायर किया जा सकता है जब व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया गया हो। अग्रिम जमानत की अर्जी पर निर्णय लेते समय न्यायालय 3 बातों की जांच करता है:
  1. क्या गिरफ्तारी से उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान होगा?
  2. क्या उस व्यक्ति के खिलाफ अपराध वैध है?
  3. क्या आवश्यकता पड़ने पर आरोपी व्यक्ति न्यायालय या जांच प्राधिकारी के समक्ष पेश होगा?

इन तीनो अधरों पर विचार करने के बाद न्यायाधीश तय करता है कि व्यक्ति को अग्रिम जमानत दी जानी चाहिए या नहीं। यदि जमानत दी जाती है तो वो व्यक्ति को प्रमाणित अग्रिम जमानत का उपयोग कर सकता हैं, जब उसे कोई पुलिस अधिकारी गिरफ्तार करने के लिए आता है।

क्या किसी F.I.R. से पहले भी अग्रिम जमानत प्राप्त कर सकते हैं?

यह जरूरी नहीं है अग्रिम जमानत किसी व्यक्ति को F.I.R. दर्ज ही जाती है। अग्रिम जमानत के लिए FIR का दाखिल होना जरुरी नहीं है। अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके खिलाफ कोई F.I.R हो सकती है तो एहतियात के तौर पर अग्रिम जमानत के लिए आवेदन दायर कर सकते हैं। और यदि F.I.R दर्ज हो गई है तो FIR की प्रमाणित प्रति मजिस्ट्रेट कोर्ट से या अपने राज्य के ऑनलाइन पोर्टल प्राप्त कर कोर्ट में अग्रिम जमानत का आवेदन किया जाता है। ऑनलाइन पोर्टल से F.I.R डाउनलोड कर सकते हैं।

यदि कोई व्यक्ति पहले से गिरफ्तार है तो क्या होगा?

  • अगर व्यक्ति पहले ही गिरफ्तार हो चुका हैं तो CrPC की धारा 437 के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन करना होता है। आमतौर पर गंभीर प्रकर्ति के अपराध में जमानत की याचिका मजिस्ट्रेट द्वारा खारिज ही करी जाती है।
  • इसके बाद बर्खास्त जमानत की प्रमाणित प्रतिलिपि लेकर उसे सेशन कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन करना होता है। CrPC की धारा 439 के तहत सेशन कोर्ट में जमानत दाखिल की जाती है। और यदि याचिका सेशन कोर्ट में भी ख़ारिज हो जाती है तो CrPC की धारा 439 के तहत High Court में जमानत के लिए आवेदन किया जाता है।
  • उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने से पहले सेशन कोर्ट से आवेदन ख़ारिज होना महत्वपूर्ण है। मामले की प्रकर्ति को देखते हुए कई बार अदालत सबूत और गवाह दर्ज करने के लिए चार्जशीट दाखिल करने से पहले जमानत से इनकार कर देती है।
  • ऐसे में कोर्ट चार्जशीट दाखिल करने के बाद जमानत दी जाती है। अगर हाई कोर्ट भी जमानत याचिका खारिज कर देता है तो अंत में सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन करना होता है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

प्रेम शंकर प्रसाद बनाम बिहार राज्य 21 अक्टूबर 2021

  • एक मामले में जहां पटना उच्च न्यायालय ने एक भगोड़े को अग्रिम जमानत दी थी। जिसके बाद जस्टिस एमआर शाह और एएस बोपन्ना, की पीठ ने उक्त आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने यह कहा कि अगर किसी अपराधी को CrPC की धारा 82 के तहत उसे भगोड़ा घोषित किया जाता है, तो वह अपराधी अग्रिम जमानत पाने का हकदार नहीं होगा।
  • इस मामले में, CrPC 1860 की धारा 406, 407, 468, 506 के तहत दंडनीय अपराधों के तहत FIR दर्ज हुई थी। इसके बाद अपराधी गिरफ्तारी से बचने के लिए भागता रहा।
  • आरोपी के खिलाफ न्यायालय में विचारण शुरू हो गया था। इसके बाद आरोपी ने  न्यायालय में अग्रिम जमानत की याचिका लगाई। जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया क्यंकि आरोपी बहुत समय से फरार था। उसके खिलाफ CrPC की धारा 82 और 83 के तहत कार्यवाही जारी हो गई थी, इसलिए आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है।

निष्कर्ष:

  • जमानत एक नियम है लेकिन जेल एक अपवाद है। यह अपराध पर निर्भर करता है की की जमानत दी जाये या नहीं। यदि अपराध गंभीर हो या गवाहों की सुरक्षा को लेकर कोई खतरा हो या अदालत में आरोपी उपस्थिति के लिए मना नहीं करे तो कोर्ट जमानत के लिए मना नहीं करता है।
  • पहले आमतौर पर जमानत याचिका खारिज हो जाती थी लेकिन अब रुझान बदल रहा है। जैसे निचली अदालतों, सत्र अदालतों और मजिस्ट्रेट जमानत की याचिकाओं को आम तौर पर खारिज कर देती थी। लेकिन अब समय बदल रहा है और अदालतें जमानत दे देती हैं।

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